साइबर इंश्योरेंस लेते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए

Cyber Insurance Importance

आज कल के इस इंटरनेट से जुड़े विश्व में दिन- प्रतिदिन नई टेक्नोलॉजी इजाद हो रही है और चीजें तेजी से बदल रही हैं। इसी के साथ इनके इस्तेमाल से जुड़े ऑपरेशनल रिस्क और साइबर अटैक का खतरा भी बड़ गया है।

आए दिन हाई प्रोफाइल लोगों की गोपनीय जानकारियाँ लीक होने की खबरें हम सुनते रहते हैं। साइबर सुरक्षा में होने वाली एक छोटी सी चूक किस हद तक किसी कंपनी को प्रभावित करती है, इसका अंदाजा लगाना और उसे कंट्रोल कर पाना बहुत मुश्किल है। अगर कोई संस्था डेटा चोरी का शिकार बनती है तो उसे कई तरह के घाटे का सामना करना पड़ सकता है, जैसे- कंपनी  का नाम ख़राब होना, प्रभावित ग्राहकों को मुआवजा देना, लोगों का कंपनी से भरोसा उठ जाना ,और कई मामलों में तो भारी जुर्माना तक भरना पड़ सकता है। यह घाटे इतने गंभीर होते हैं कि कंपनी का अस्तित्व तक खतरे में पड़ सकता है।  साइबर हमलों से होने वाले गंभीर नुकसान से बचने के लिए  साइबर इंश्योरेंस  लेना एक बहुत अच्छा विकल्प है।

Need of Cyber Insurance


साइबर इंश्योरेंस  लेते समय कुछ गौर करने वाली बातें –

•    कोई भी साइबर इंश्योरेंस  प्लान लेने से पहले यह समझना जरुरी है कि कंपनी के पास किस तरह का संवेदनशील डेटा है, उसने किस तरह के सुरक्षा नियम अपना रखे है, डेटा ब्रीच होने का संभावित खतरा कितना है, अगर डेटा ब्रीच होता है तो कंपनी की किस तरह की लायेबिलिटी बनती है और उसके लिए उसे कितना बीमा कवरेज की जरुरत है।
•    कवरेज - किसी भी साइबर इंश्योरेंस  कंपनी का प्लान चुनने से पहले यह देखना जरुरी है कि उसका कवरेज क्या है। साइबर इंश्योरेंस  में दो तरह का कवरेज होता है -फर्स्ट पार्टी कवरेज और थर्ड पार्टी कवरेज। फर्स्ट पार्टी कवरेज में फिशिंग और स्पूफ़िंग की वजह से पैदा होने वाली लायेबिलिटी और उसमे मिलने वाले कवरेज को देखा जाता है। फिशिंग के द्वारा माल्वेयर कंप्यूटर नेटवर्क में दाखिल होता है, और स्पूफ़िंग में साइबर अपराधी धोखे से हमारे बैंक अकाउंट की जानकारी अपने पास ले लेता है। थर्ड पार्टी इंश्योरेंस  किसी भी कारोबारी  को उस समय मदद करता है जब डाटा ब्रीच होने पर उसके खिलाफ प्रभावित पार्टियाँ मुकदमा दायर कर देती हैं। साइबर इंश्योरेंस  लेते समय यह देखना चाहिए कि इन दोनों तरह के मामलों में पैदा होने वाली लायेबिलिटी को इंश्योरेंस  कवर करता है या नहीं।
•    सब- लिमिट की जानकारी - इंश्योरेंस  में क्लेम की गई राशि पर लगने वाले लिमिट को सब-लिमिट कहते हैं। साइबर इंश्योरेंस  पॉलिसी लेते समय यह देखना जरुरी है कि कौन से कवरेज पर इंश्योरेंस  कंपनी कितने का सब- लिमिट लगा रही है। जैसे-  बजाज आलियान्ज़ अपने साइबर इंश्योरेंस   पॉलिसी में इ -मेल स्पूफ़िंग पर 15%, फिशिंग पर 25% और सोशल मीडिया कवरेज पर 10% का सब -लिमिट लगाती है। मान लीजिये अगर साइबर इंश्योरेंस  प्लान 2 लाख रुपये का है , तो इ -मेल स्पूफ़िंग होने पर सिर्फ 30 हज़ार रुपये का और फिशिंग  होने पर 50 हज़ार रुपये का क्लेम मिलेगा।  इसी तरह की अन्य सुविधाओं पर भी अलग- अलग इंश्योरेंस  कम्पनियों के प्लान में सब लिमिट देखने को मिलते हैं।
•    एक समय पर एक ही तरह का क्लेम - अगर किसी सिस्टम के साथ साइबर ब्रीच से जुड़ी एक से ज्यादा घटना एक साथ घट जाती है, जैसे माल्वेयर ने अटैक कर दिया, साइबर अपराधी ने ग्राहकों के अकाउंट को हैक कर दिया, आदि, तो  ऐसे में ज्यादातर इंश्योरेंस  कम्पनियाँ, एक समय पर, किसी एक घटना से जुड़ा क्लेम ही आपको देगी।
•    इंश्योरेंस  क्लेम करने की शुरुवाती तारीख - ज्यादातर साइबर इंश्योरेंस  कम्पनियाँ किसी भी तरह के साइबर क्राइम से जुड़े नुकसान का क्लेम उस दिन से देना शुरू करते हैं, जिस दिन से पॉलिसी की शुरुवात होती है। कोई भी साइबर दुर्घटना जो उस तारीख से पहले घट चुकी होती है, उसका क्लेम नहीं दिया जाता। यदि इंश्योरेंस  लेने के कुछ समय बाद किसी तरह की साइबर दुर्घटना का पता चलता है, तो कंप्यूटर की भाषा को पढ़ कर यह मालूम हो जाता है कि उस घटना की शुरुवात कब हुई थी, और अगर वह तारीख इंश्योरेंस  लेने से पहले की पाई जाती है, तो ऐसे में क्लेम मिलना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। 
•    कंप्यूटर सिस्टम अपडेट रखना- कुछ साइबर इंश्योरेंस  पॉलिसी में यहा देखा गया है कि अगर पॉलिसीहोल्डर ने कंप्यूटर सिस्टम को साइबर अटैक से बचाने के लिए जरुरी सुरक्षा का बंदोबस्त नहीं  किया है, जैसे - एंटीवायरस ,विंडो फ़ायरवॉल आदि अपडेट रखना, तो सुरक्षा में लापरवाही बरतने का कारण बताकर इंश्योरेंस  कंपनी क्लेम देने में दिक्कत कर सकती है। अगर हम सिस्टम को साइबर अटैक से बचाने के लिए अपडेटेड रखते हैं, तो इंश्योरेंस  कंपनी प्रीमियम में भी छूट देती है।
इंटरनेट से जुड़े अलग अलग तरह के कारोबार में अलग -अलग प्रकार के अपराध होते हैं, जैसे -कॉपीराइट से जुड़ा मामला, कंप्यूटर द्वारा फ्रॉड काम करना, जाने माने लोगों की निजि जानकारियों को सार्वजनिक कर देना ,माल्वेयर द्वारा डाटा करप्ट कर देना, आदि। इसलिए साइबर इंश्योरेंस  में कुछ खास तरह की पॉलिसी खास तरह के कारोबारियों को ध्यान में रख कर भी बनाया गया है, जिसे अपनी जरुरत के हिसाब से प्लान में  शामिल किया जा सकता है।  

साइबर इंश्योरेंस  पॉलिसी अन्य इंश्योरेंस  के मुकाबले में नया है, और इसे समझने में थोड़ा सा समय लगता है। साइबर इंश्योरेंस   तो डाटा ब्रीच होने के बाद हरकत में आता है, लेकिन जब हम बड़े पैमाने पर अपने इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में तरह तरह का  डाटा इकट्ठा करके रखते हैं तो यह हमारी भी जिम्मेदारी बनती है कि अपनी ओर से सुरक्षा के पूरे प्रबंध  कर के रखें ताकि कोई भी साइबर अपराधी जल्दी से हमला न कर सके।
लेख में लिखी गई बातें जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से हैं। इस विषय को गहराई से जानने के लिए बाजार में मौज़ूद साइबर इंश्योरेंस  कंपनियों से सीधे जानकारी प्राप्त करें।

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Very Helpful article

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